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कबीरधाम की संकरी नदी पर मौत का साया

कभी जीवन देती थी, अब जहर उगल रही है नदी; जिम्मेदारों की चुप्पी पर फूटा जनाक्रोश
- करोड़ों के विकास कार्य सिर्फ कागजों तक सीमित, धरातल पर विनाश
- गांवों में जलसंकट गहराया, दूषित पानी से बीमारी फैलने का खतरा
- ग्रामीणों की चेतावनी — “अब नदी बचाओ आंदोलन होगा आर-पार”
कबीरधाम की जीवनरेखा दम तोड़ रही है
कभी खेतों को हरियाली देने वाली, गांवों की प्यास बुझाने वाली और क्षेत्र की संस्कृति की पहचान मानी जाने वाली संकरी नदी आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है। जिस नदी को लोग श्रद्धा और जीवन का आधार मानते थे, वही आज गंदगी, सीवर और भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा शिकार बन चुकी है।
नदी का पानी अब काला पड़ चुका है। शहर और आसपास के गांवों का गंदा पानी सीधे नदी में छोड़ा जा रहा है। जगह-जगह कचरे के ढेर और प्लास्टिक का अंबार नदी की सांसें रोक रहा है। हालात इतने भयावह हो चुके हैं कि अब यह नदी नहीं, बल्कि बहता हुआ जहरीला नाला नजर आने लगी है।
विकास के नाम पर करोड़ों बहाए, नदी फिर भी बदहाल
संकरी नदी के संरक्षण, गहरीकरण और सौंदर्यीकरण के नाम पर करोड़ों रुपये स्वीकृत हुए, लेकिन नदी की हालत देखकर साफ समझ आता है कि अधिकांश काम सिर्फ सरकारी फाइलों और फोटोशूट तक सीमित रहे।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि कागजों में मशीनें चलीं, मजदूरी निकाली गई, योजनाएं पूरी दिखा दी गईं, लेकिन जमीनी हकीकत में नदी को बचाने के लिए कोई ठोस काम नहीं हुआ।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि इतने वर्षों में खर्च हुए पैसों का निष्पक्ष ऑडिट हो जाए, तो बड़े स्तर का घोटाला सामने आ सकता है।



