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अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता हुआ कम ! भारत ब्रिक्स देशों संग डिजिटल पेमेंट सिस्टम कर रहा विकसित, ट्रंप को लगेगा झटका

इस प्लान को भारत के केंद्रीय बैंक यानी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने पेश किया है. प्रस्ताव के तहत ब्रिक्स देश सीमा-पार लेनदेन को स्थानीय मुद्राओं में निपटाने की अनुमति देने पर विचार कर रहा है.

भारत ब्रिक्स देशों के साथ मिलकर एक डिजिटल पेमेंट सिस्टम विकसित करने की योजना बना रहा है ताकि अमेरिकी डॉलर की अस्थिरता और पश्चिमी प्रतिबंधों के प्रभाव को कम किया जा सके. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने इस प्रस्ताव को पेश किया है, जिसमें स्थानीय मुद्राओं में सीमा-पार लेनदेन की अनुमति दी जाएगी.

विश्लेषकों के अनुसार, इसका असरदार साबित होना इस बात पर निर्भर करेगा कि समूह के सदस्य पश्चिम-नियंत्रित पेमेंट चैनलों पर अपनी निर्भरता को कितनी हद तक कम कर सकते हैं, बिना अमेरिका को चिंतित किए.

ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों की 14-15 मई को नई दिल्ली में बैठक होनी है जो 10-11 सितंबर को होने वाले शिखर सम्मेलन से पहले होगी. बैठक में पेमेंट कनेक्टिविटी और व्यापार सेटलमेंट एजेंडा के प्रमुख मुद्दों में शामिल होने की उम्मीद है. 2009 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन ने ब्रिक्स का गठन किया था जिसके बाद इसमें दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात को सदस्य के रूप में शामिल किया है.

नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर चाइनीज स्टडीज में वरिष्ठ सहायक प्रोफेसर गीता कोच्छर ने हॉन्गकॉन्ग स्थित अखबार ‘साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट’ से बात करते हुए कहा कि ब्रिक्स के भीतर एक फाइनेंशियल पेमेंट सिस्टम सदस्य देशों को बहुत फायदा पहुंचाएगा और इससे उन पर बाहरी बदलावों का असर कम होगा.

उन्होंने कहा, ‘पश्चिम के आर्थिक दबाव के खिलाफ इम्यूनिटी देने वाला यह एक रणनीतिक उपकरण साबित होगा. अगर डॉलर में अस्थिरता भी होती है, तो इसका पेमेंट पर असर नहीं पड़ेगा क्योंकि यह लगभग रियल-टाइम भुगतान होगा.’

ऐसा सिस्टम भारतीय रुपये और अन्य ब्रिक्स मुद्राओं को अधिक पावर देगा. इसके बाद इन देशों को पश्चिम के मध्यस्थ बैंकों का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा और डॉलर को दूसरी मुद्रा में बदलने में जो कंवर्जन फीस लगती है, वो भी नहीं लगेगी.

वरिष्ठ सहायक प्रोफेसर गीता कोच्छर ने कहा कि एक ब्रिक्स पेमेंट सिस्टम भारत और अन्य देशों के लिए महत्वपूर्ण वस्तुओं के आयात और पश्चिम के वित्तीय प्रतिबंधों को दरकिनार करने के लिए ‘बीमा पॉलिसी’ होगी. उन्होंने बताया कि ब्रिक्स अपनी आर्थिक ताकत के कारण आंतरिक मुद्रा प्रबंधन को आकार दे सकता है, क्योंकि वैश्विक तेल का लगभग 42 प्रतिशत और अनाज का 40 प्रतिशत उत्पादन इस समूह के सदस्य देश करते हैं.

दिल्ली के काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर बिस्वजीत धर ने कहा कि भारत को अपने ब्रिक्स प्रस्ताव को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को नाराज करने से बचना चाहिए, क्योंकि वो अमेरिका के साथ एक व्यापार समझौता करने की कोशिश कर रहा है. धर ने कहा कि ट्रंप अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देने वाले किसी भी कदम से खुश नहीं होंगे.

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रणनीतिक अध्ययन के उप निदेशक विवेक मिश्रा ने कहा कि इस पेमेंट सिस्टम को शुरू करने से पहले भारत को अमेरिका को भरोसे में लेना चाहिए कि इससे डॉलर को चुनौती नहीं मिलेगी. ब्रिक्स पेमेंट सिस्टम का मकसद अकाउंट सेटलमेंट की प्रक्रिया को आसान बनाना है. जैसे कि रूस से तेल खरीद के लिए भारत अपनी मुद्रा में पेमेंट करता है.

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