नकटी गाँव में बुलडोजर, बैरिकेड और बंद कैमरे! आखिर किससे डर गया प्रशासन?

“हमारे सिर से छत छिन गई। बरसात के मौसम में अब छोटे-छोटे बच्चों को लेकर कहां जाएं? वर्षों की मेहनत से बनाया आशियाना कुछ ही घंटों में मलबे में बदल गया। अब हमारे पास न रहने की जगह बची है, न भविष्य की कोई उम्मीद दिख रही है।” — प्रभावित परिवारों की पीड़ा
रायपुर।
राजधानी रायपुर से लगे नकटी गाँव में विधायक कॉलोनी निर्माण के लिए चलाए गए बेदखली अभियान ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कार्रवाई के दौरान बुलडोजर तो बेखौफ चलते रहे, लेकिन लोकतंत्र की आवाज़ माने जाने वाले मीडिया के कैमरों पर पहरा बैठा दिया गया। पत्रकारों को घटनास्थल तक पहुंचने से रोक दिया गया, जिससे पूरी कार्रवाई की पारदर्शिता संदेह के घेरे में आ गई।
करीब 80 से अधिक मकानों को ध्वस्त करने के दौरान पूरे क्षेत्र को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया। हर प्रमुख मार्ग पर बैरिकेडिंग कर मीडिया की एंट्री रोक दी गई। स्वतंत्र कवरेज पर लगी इस रोक ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि यदि कार्रवाई पूरी तरह वैधानिक और न्यायसंगत थी, तो फिर कैमरों से दूरी क्यों बनाई गई?
ग्रामीणों का कहना है कि जिन मकानों को हटाया गया, उनमें कई प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने थे और वर्षों से सरकारी बिजली-पानी जैसी सुविधाओं से जुड़े थे। दूसरी ओर प्रशासन ने केवल अपना आधिकारिक पक्ष जारी किया, जबकि घटनास्थल की वास्तविक तस्वीरें और आवाज़ें जनता तक नहीं पहुंच सकीं।
लोकतंत्र में प्रेस केवल समाचार का माध्यम नहीं, बल्कि सत्ता की जवाबदेही तय करने का सबसे प्रभावी उपकरण है। ऐसे में पत्रकारों को कवरेज से रोकना केवल मीडिया की स्वतंत्रता पर प्रश्न नहीं, बल्कि जनता के सूचना के अधिकार पर भी सीधा आघात माना जा रहा है।
प्रशासन पुनर्वास की बात कर रहा है, लेकिन मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंध ने पूरे घटनाक्रम को विवादों के केंद्र में ला दिया है।
आखिर सवाल वही है—
अगर कार्रवाई पारदर्शी थी, तो कैमरों पर पहरा क्यों?
अगर सब कुछ कानून के दायरे में था, तो पत्रकारों को रोकने की जरूरत क्यों पड़ी?
नकटी की घटना अब सिर्फ बेदखली की नहीं, बल्कि लोकतंत्र, पारदर्शिता और प्रेस की स्वतंत्रता की परीक्षा बन गई है।



