वनमंडल में 14.77 लाख के घोटाले का खुलासा, आरोपी कैम्पा शाखा प्रभारी को किया गया सस्पेंड

गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही। छत्तीसगढ़ विधानसभा में गूंजे करोड़ों की योजनाओं में गड़बड़ी से जुड़े एक बड़े मामले में वन विभाग ने आखिरकार सख्त कार्रवाई करते हुए मरवाही वनमंडल की कैम्पा शाखा के प्रभारी एवं सहायक ग्रेड-02 भूपेंद्र कुमार साहू को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। उन पर वृक्षारोपण कार्य के लिए गोबर खाद खरीदी में वित्तीय अनियमितता, फर्जी दस्तावेज तैयार करने और शासकीय राशि के अवैध समायोजन जैसे गंभीर आरोप लगे हैं।
बिलासपुर वन वृत्त के मुख्य वन संरक्षक (CCF) मनोज कुमार पांडेय द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि प्रारंभिक जांच में भूपेंद्र साहू की भूमिका संदिग्ध और नियमों के विपरीत पाई गई है। यह मामला पहले ही विधानसभा में उठ चुका था, जिसके बाद विभागीय स्तर पर जांच तेज की गई थी।
जांच में खुला फर्जीवाड़े का खेल
प्रधान मुख्य वन संरक्षक, नवा रायपुर द्वारा कराई गई जांच में सामने आया कि वर्ष 2022 में मरवाही वनमंडल में वृक्षारोपण कार्य के लिए गोबर खाद खरीदी के नाम पर बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की गई। जांच में पाया गया कि फर्जी और कूट रचित प्रमाण-पत्रों के आधार पर ₹14 लाख 77 हजार 600 की राशि का अवैध लेखा समायोजन किया गया।
जांच रिपोर्ट के अनुसार समिति सचिवों पर दबाव बनाकर सरकारी धन के गबन की कोशिश की गई। शिकायतों की पुष्टि होने के बाद विभाग ने इसे गंभीर वित्तीय कदाचार माना है।
जांच अधिकारियों को भी किया गुमराह
भूपेंद्र साहू पर आरोप है कि उन्होंने जांच के दौरान अधिकारियों को लगातार गुमराह करने का प्रयास किया। विभागीय अधिकारियों के फर्जी हस्ताक्षर और दस्तावेजों का सत्यापन किए बिना ही एलओसी (LOC) तैयार कराई गई। इतना ही नहीं, उन्होंने वनमंडलाधिकारी (DFO) को भी पूरे मामले से अंधेरे में रखा।
जांच के दौरान उनके बयान भी बदलते रहे। पहले उन्होंने कहा कि संबंधित वाउचर पुराने बस्ते में रखे हैं, बाद में दावा किया कि वाउचर उप-वनमंडल कार्यालय पेंड्रा से प्राप्त हुए हैं। विभाग ने इसे गंभीर लापरवाही, धोखाधड़ी और साजिश में मिलीभगत माना है।
आचरण नियमों के उल्लंघन का आरोप
वन विभाग ने माना कि भूपेंद्र साहू का कृत्य छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के नियम-3 के विपरीत है। इसी आधार पर छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम, 1966 के तहत उन्हें निलंबित किया गया है।
निलंबन अवधि में उनका मुख्यालय मुख्य वन संरक्षक कार्यालय, बिलासपुर निर्धारित किया गया है। उन्हें नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता मिलेगा, लेकिन सक्षम अनुमति के बिना मुख्यालय छोड़ने की अनुमति नहीं होगी।

मरवाही वनमंडल पर पहले से उठते रहे सवाल
मरवाही वनमंडल पिछले कुछ वर्षों से लगातार भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितताओं और अवैध कटाई के मामलों को लेकर चर्चा में रहा है। विभागीय सूत्रों के मुताबिक यहां योजनाओं की राशि धरातल पर पहुंचने से पहले ही कमीशनखोरी के जाल में उलझ जाती है।
वनों की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाले विभाग पर ही जंगलों की अवैध कटाई रोकने में विफल रहने के आरोप लगते रहे हैं। कई मामलों में कार्रवाई केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित रह गई, जबकि बड़े अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठते रहे हैं।
अब विधानसभा तक मामला पहुंचने और विभागीय जांच में अनियमितताओं की पुष्टि होने के बाद मरवाही वनमंडल एक बार फिर सुर्खियों में है। हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि केवल निलंबन से हालात नहीं बदलेंगे, बल्कि पूरे तंत्र की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई जरूरी है।



