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महिला अध्यक्ष की कुर्सी पर सियासी जंग, सक्रियता बनाम अनुभव की टक्कर तेज…

वरिष्ठों को किनारे कर ‘नई टीम’ का प्रयोग… कहीं कांग्रेस को फिर न भारी पड़ जाए!
दुर्ग// दुर्ग शहर कांग्रेस इन दिनों अंदरूनी खींचतान, बदलते समीकरण और पद की राजनीति के चलते सुर्खियों में है। खासतौर पर महिला कांग्रेस अध्यक्ष पद को लेकर संगठन के भीतर हलचल तेज हो गई है।
एक ओर अनुभवी और पुराने नेताओं का दबदबा है, तो दूसरी ओर नई सक्रियता और आक्रामक मीडिया रणनीति के सहारे उभरते चेहरे अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं।
सक्रियता या रणनीतिक दावेदारी…?
शहर कांग्रेस की महामंत्री निकिता मिलिंद का नाम इन दिनों अचानक चर्चा के केंद्र में आ गया है।
हाल के दिनों में उनकी लगातार प्रेस विज्ञप्तियां, केंद्र सरकार पर तीखे बयान और मीडिया में बढ़ती मौजूदगी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं:–
➡️ क्या यह सक्रियता संगठन में पकड़ मजबूत करने की रणनीति है..?
➡️ या फिर यह महिला कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचने की सियासी तैयारी…?
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि यह पूरा प्रयास शहर अध्यक्ष धीरज बाकलीवाल के करीबी बनने की दिशा में एक सोची-समझी चाल हो सकता है।
अनुभव बनाम नई दावेदारी..
जहां एक ओर पूर्व महापौर प्रत्याशी प्रेमलता साहू का नाम इस पद के लिए सबसे मजबूत माना जा रहा है,
वहीं दूसरी ओर नई पीढ़ी के नेताओं की सक्रियता इस समीकरण को चुनौती देती नजर आ रही है।
प्रेमलता साहू के संगठन में मजबूत संबंध और अनुभव उन्हें स्वाभाविक दावेदार बनाते हैं, लेकिन बदलती राजनीति में केवल अनुभव ही पर्याप्त होगा, यह सवाल अब खुलकर सामने है।
वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी….?
दुर्ग कांग्रेस की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल अब यह उठ रहा है..?
क्या पार्टी अपने ही वरिष्ठ नेताओं को धीरे-धीरे हाशिए पर डाल रही है..?
एक समय तक संगठन में प्रभाव रखने वाला वोरा परिवार अब पहले जैसा प्रभावी नहीं दिख रहा।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह बदलाव सिर्फ स्वाभाविक नहीं, बल्कि रणनीतिक पुनर्संरचना का हिस्सा है।
दिलचस्प बात यह भी है कि…
➡️ जो नेता पहले एक-दूसरे के विरोधी थे, अब एक मंच पर नजर आ रहे हैं,
➡️ और जो कभी करीबी थे, वे दूरी बनाते दिख रहे हैं,
गुटबाजी से ‘एकजुटता’ तक–या सिर्फ दिखावा..?
नगर निगम की राजनीति में पहले महापौर कक्ष और सभापति कक्ष तक गुटबाजी साफ नजर आती थी।
लेकिन अब वही चेहरे एक साथ दिखाई दे रहे हैं।
सवाल यह है:—
➡️ क्या यह वास्तविक एकजुटता है..?
➡️ या बदलते राजनीतिक समय के हिसाब से किया गया सामंजस्य..?
विपक्ष की भूमिका पर भी सवाल…?
जहां शहर में भ्रष्टाचार और अव्यवस्था जैसे मुद्दे चर्चा में हैं,
वहीं कांग्रेस की भूमिका अपेक्षाकृत कमजोर नजर आ रही है।
हैरानी की बात यह रही कि:—
➡️ नगर निगम की सामान्य सभा में सत्ता पक्ष के पार्षद ही अपनी सरकार को घेरते दिखे!
➡️ जबकि कांग्रेस की आक्रामकता अपेक्षित स्तर पर नजर नहीं आई!
सोशल मीडिया की राजनीति बनाम जमीनी संघर्ष
दुर्ग कांग्रेस में अब यह बहस भी तेज है कि—
क्या राजनीति जमीनी आंदोलनों से हटकर सिर्फ सोशल मीडिया और प्रेस विज्ञप्तियों तक सिमट रही है..?
निकिता मिलिंद की सक्रियता को भी इसी नजरिए से देखा जा रहा है,
जहां राष्ट्रीय मुद्दों पर बयानबाजी ज्यादा और स्थानीय मुद्दों पर अपेक्षाकृत कम फोकस नजर आता है।
क्या इतिहास से नहीं ले रही सीख…?
पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के पीछे एक बड़ा कारण..?
अंदरूनी कलह और “अपने ही खिलाफ लड़ाई” को माना गया।
अब सवाल फिर वही:—
➡️ क्या कांग्रेस उसी रास्ते पर दोबारा बढ़ रही है..?
➡️ क्या वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी पार्टी को फिर नुकसान पहुंचा सकती है..?
आगे क्या…?
दुर्ग कांग्रेस की मौजूदा स्थिति साफ संकेत दे रही है कि
संगठन में बड़ा बदलाव जारी है
नई टीम बन रही है,
और कुर्सी की दौड़ अपने चरम पर है
अब देखने वाली बात होगी—
👉 क्या अनुभव और पुराना नेटवर्क बाजी मारेगा..?
👉 या नई सक्रियता और रणनीति संगठन का चेहरा बदल देगी..?
निष्कर्ष…?
दुर्ग कांग्रेस की राजनीति फिलहाल एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां
“कुर्सी एक है, दावेदार कई… और सियासत अपने पूरे शबाब पर!”

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