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छत्तीसगढ़ के ‘खजुराहो’ में परंपरा पर चोट: भोरमदेव महोत्सव तीन दिन से घटकर एक दिन

परंपरा पर कैंची: तीन दिन का भोरमदेव महोत्सव सिमटकर एक दिन, प्रशासन के फैसले से भड़की जनभावनाएं


कवर्धा। छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर स्थल  में हर वर्ष आयोजित होने वाला भव्य भोरमदेव महोत्सव इस बार अपने अस्तित्व के संकट से जूझता नजर आ रहा है। वर्षों से तीन दिनों तक भव्यता के साथ आयोजित होने वाला यह महोत्सव अब घटकर महज एक दिन का औपचारिक आयोजन बनकर रह गया है। शासन-प्रशासन के इस फैसले से स्थानीय जनता, संस्कृति प्रेमियों और सामाजिक संगठनों में भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है।
भोरमदेव मंदिर परिसर में आयोजित होने वाला यह महोत्सव केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं बल्कि क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान, धार्मिक आस्था और लोक परंपराओं का प्रतीक माना जाता है। मैकाल पर्वत श्रृंखला की सुरम्य वादियों के बीच स्थित भोरमदेव मंदिर को छत्तीसगढ़ का “खजुराहो” भी कहा जाता है। इसी ऐतिहासिक महत्व को ध्यान में रखते हुए वर्षों से यहां भव्य महोत्सव आयोजित किया जाता रहा है, जिसमें प्रदेश भर से कलाकार, पर्यटक और श्रद्धालु बड़ी संख्या में शामिल होते रहे हैं।
तीन दिन की परंपरा अब एक दिन में सिमटी
स्थानीय नागरिकों के अनुसार भोरमदेव महोत्सव लंबे समय से तीन दिनों तक आयोजित होता रहा है। इस दौरान लोक संस्कृति, नृत्य, संगीत और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की समृद्ध परंपराओं का प्रदर्शन किया जाता था। लेकिन पिछले दो वर्षों से इस महोत्सव की अवधि धीरे-धीरे कम की जा रही है। पहले इसे दो दिनों तक सीमित किया गया और अब इस वर्ष इसे घटाकर केवल एक दिन का आयोजन कर दिया गया है।
इस निर्णय को लेकर क्षेत्रीय नागरिकों का कहना है कि प्रशासन धीरे-धीरे इस ऐतिहासिक महोत्सव की चमक को फीका कर रहा है। लोगों के मन में अब यह आशंका घर करने लगी है कि कहीं भविष्य में इस आयोजन को पूरी तरह समाप्त करने की तैयारी तो नहीं की जा रही।
करोड़ों के विकास कार्य, लेकिन महोत्सव में कटौती
एक ओर केंद्र सरकार द्वारा भोरमदेव मंदिर के जीर्णोद्धार और पर्यटन विकास के लिए भव्य भोरमदेव कॉरिडोर निर्माण हेतु लगभग 146 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई है। पर्यटन और विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच महोत्सव की अवधि घटाना प्रशासन की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब मंदिर परिसर को पर्यटन के बड़े केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना बनाई जा रही है, तब इस तरह के ऐतिहासिक महोत्सव को छोटा करना समझ से परे है।
पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर
भोरमदेव महोत्सव केवल सांस्कृतिक आयोजन ही नहीं बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। महोत्सव के दौरान प्रदेश और देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले पर्यटकों की वजह से स्थानीय व्यापारियों, होटल व्यवसायियों, हस्तशिल्प कलाकारों और छोटे दुकानदारों को अच्छा आर्थिक लाभ मिलता है। लेकिन आयोजन की अवधि घटने से पर्यटन गतिविधियों पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
जनभावनाओं से जुड़ा है यह महोत्सव
स्थानीय सामाजिक संगठनों और संस्कृति प्रेमियों का कहना है कि यह महोत्सव क्षेत्र की पहचान और जनभावनाओं से जुड़ा हुआ है। महाशिवरात्रि और चैत्र माह के पावन अवसर पर आयोजित होने वाला यह उत्सव धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। ऐसे में इसे छोटा करना लोगों की भावनाओं को आहत करने जैसा माना जा रहा है।
जनता की मांग — वापस मिले तीन दिवसीय गौरव
सोशल मीडिया से लेकर स्थानीय स्तर पर इस निर्णय के खिलाफ आवाजें उठने लगी हैं। क्षेत्रीय नागरिकों और बुद्धिजीवियों ने प्रशासन से मांग की है कि भोरमदेव महोत्सव को फिर से पहले की तरह तीन दिनों तक भव्यता के साथ आयोजित किया जाए।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि प्रशासन ने समय रहते इस निर्णय पर पुनर्विचार नहीं किया, तो यह छत्तीसगढ़ की एक गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा के धीरे-धीरे समाप्त होने का संकेत हो सकता है। लोगों ने शासन और प्रशासन से अपील की है कि इस ऐतिहासिक विरासत और सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए महोत्सव की पुरानी परंपरा को फिर से बहाल किया जाए।

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