25 लाख वोटरों के नाम हटने पर सियासी संग्राम: कांग्रेस का सवाल—वोटर लिस्ट का खेल या सूची का शुद्धिकरण?

रायपुर। छत्तीसगढ़ में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के बाद करीब 24 लाख 99 हजार 823 मतदाताओं की कमी ने सियासी बहस तेज कर दी है। अंतिम मतदाता सूची में अब प्रदेश में 1 करोड़ 87 लाख 30 हजार 914 मतदाता दर्ज हैं। निर्वाचन विभाग की ओर से इसे मतदाता सूची के शुद्धिकरण की प्रक्रिया बताया गया है, जबकि कांग्रेस ने इतनी बड़ी संख्या में नाम हटने को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
कांग्रेस ने उठाए सवाल—इतने बड़े पैमाने पर नाम कैसे हटे?
प्रदेश कांग्रेस संचार प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला ने SIR की प्रक्रिया पर तीखा हमला बोलते हुए इसे छत्तीसगढ़ के लोकतांत्रिक इतिहास का गंभीर मामला बताया है। कांग्रेस का आरोप है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं को अनुपस्थित, शिफ्टेड या मृत बताकर सूची से बाहर किया गया।
कांग्रेस का दावा है कि 19 लाख 13 हजार 540 मतदाताओं को अनुपस्थित या शिफ्टेड बताया गया, जबकि 6 लाख से अधिक लोगों को मृत श्रेणी में रखा गया। पार्टी ने सवाल उठाया है कि क्या इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाने से पहले प्रत्येक मामले का पर्याप्त भौतिक सत्यापन किया गया था?
विजय शर्मा पर सीधा निशाना
कांग्रेस ने उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा के SIR को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बताए जाने पर भी सवाल उठाए हैं। सुशील आनंद शुक्ला ने उन्हें चुनाव आयोग का “स्वयंभू प्रवक्ता” नहीं बनने की नसीहत देते हुए कहा कि सरकार को प्रक्रिया का बचाव करने के बजाय मतदाताओं के नाम हटाए जाने से जुड़े सवालों का जवाब देना चाहिए।
कांग्रेस का आरोप है कि SIR की प्रक्रिया में कंप्यूटर आधारित फिल्टर और रिकॉर्ड के आधार पर नामों पर कार्रवाई की गई, जबकि पार्टी व्यापक स्तर पर भौतिक सत्यापन की मांग कर रही है। ये आरोप कांग्रेस के हैं और इनके समर्थन में स्वतंत्र सत्यापन का प्रश्न अभी राजनीतिक विवाद का हिस्सा है।
बिलासपुर से लेकर बस्तर तक शिकायतों का दावा
कांग्रेस ने बिलासपुर के तीन बूथों का उदाहरण देते हुए दावा किया कि एक साथ 117 मतदाताओं के नाम हटाए गए, लेकिन आपत्ति के बाद भौतिक सत्यापन में ये मतदाता मौजूद पाए गए।
पार्टी ने रायपुर, बिरगांव, बालोद, दुर्ग और बस्तर समेत कई इलाकों में भी नाम हटाए जाने को लेकर शिकायतों का दावा किया है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और प्रत्येक मामले का निर्वाचन विभागीय रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होगा।
कांग्रेस का सबसे बड़ा सवाल—क्या 25 लाख लोगों के नाम सार्वजनिक होंगे?
विपक्ष ने सरकार और निर्वाचन तंत्र के सामने सीधा सवाल रखा है—यदि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और नियमों के तहत हुई है, तो 24 लाख 99 हजार 823 नामों की बूथवार जानकारी सार्वजनिक कर उनकी स्थिति की जांच क्यों न कराई जाए?
कांग्रेस यह भी मांग कर रही है कि जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, उनके मामलों में BLO मौके पर जाकर सत्यापन करें, पंचनामा तैयार करें और उसके बाद ही विलोपन की कार्रवाई को अंतिम रूप दिया जाए।
लेकिन निर्वाचन विभाग का पक्ष भी महत्वपूर्ण
दूसरी ओर, अंतिम मतदाता सूची जारी करते समय निर्वाचन अधिकारियों ने बताया था कि पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना था और प्रक्रिया में मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट अथवा अपात्र प्रविष्टियों को हटाया गया। ड्राफ्ट सूची के बाद दावा-आपत्तियों की प्रक्रिया में 2 लाख 34 हजार 994 नाम फिर जोड़े गए, जिसके बाद अंतिम संख्या 1 करोड़ 87 लाख 30 हजार 914 हुई।
यानी विवाद का असली केंद्र सिर्फ “कितने नाम हटे?” नहीं है, बल्कि यह है कि “किन कारणों से हटे, उनका सत्यापन कैसे हुआ और जिनके नाम गलत तरीके से हटे हैं, उन्हें वापस जोड़ने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है?”
सियासत के बीच मतदाता सबसे बड़ा मुद्दा
SIR को लेकर कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़ रही है, जबकि निर्वाचन तंत्र इसे मतदाता सूची के शुद्धिकरण की प्रक्रिया बता रहा है।
अब सबसे अहम सवाल यही है—
क्या 24 लाख 99 हजार 823 नामों में से प्रत्येक विलोपन का कारण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जा सकता है?
क्या गलत तरीके से हटे किसी मतदाता का नाम आसानी से वापस जुड़ सकता है?
और सबसे बड़ा सवाल—
मतदाता सूची शुद्ध करने की प्रक्रिया में कहीं एक भी वास्तविक मतदाता छूट गया, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
क्योंकि चुनाव में राजनीतिक दल जीत-हार का हिसाब लगाते हैं, लेकिन मतदाता सूची में दर्ज हर वास्तविक नागरिक का नाम लोकतंत्र में उसके अधिकार की पहचान है।



